टूटते बिखरते परिवार (चिंतन)
पाश्चात्य देशों की देखादेखी या आज के शिक्षित युवाओं की सोच के कारण भारत जैसे देश में भी संयुक्त परिवार प्रणाली टूटते जा रही है।अधिकांश लोग पति पत्नी और बच्चों के साथ रहकर जीवनयापन करने की चाह रखते हैं।वे अलग घर बसाकर  संयुक्त परिवार के बोझ ,अपने कर्तव्य ,उत्तरदायित्व और नियंत्रण से स्वतंत्र होकर सुख सुविधा का जीवन जीने की चेष्टा करते हैं।
पर इनके गुण दोषों पर चिंतन करें तो हम पाते हैं कि एकल परिवार शुरू शुरू में तो अच्छा लगता है क्योंकि स्वछंदता मिल जाती है पर कुछ समय के बाद परिवार की कमी खलने लगती है।नन्हें बच्चों को सम्हालने के लिए बड़े बुजुर्गों की ज़रूरत पड़ती ही है।बीमारी ,दुख दर्द, दुर्घटना,विवाह  या किसी असमर्थता के समय संयुक्त परिवार का लाभ समझ आता है।
घर की पूंजी और घर का श्रम मिल जाये तो निश्चित ही लाभ होगा। बढ़ती उम्र और वृद्धावस्था को शांति से जीने के लिए संयुक्त परिवार ही अनुकूल होता है।कृषिप्रधान देशों में संयुक्त परिवार तो वरदान है।जहाँ माता पिता, भाई बहन और परिवार की समस्याओं को समझते और सुलझाते हुए व्यक्ति अपने स्वार्थ को भूलकर उदार बनते जाता है।उनका भावनात्मक विकास  होते जाता है।
जब कर्तव्यों और अधिकारों का विभाजन सही ढंग से नहीं हो पाता तब मनमुटाव बढ़ता है और परिवार बिखरते जाते हैं।परस्पर सहयोग, प्रेम, सद्भाव ,सम्मान और शिष्टाचार से असंतोष और मन की मलिनता दूर होती है।हर छोटे बड़े को अपने कर्तव्यों को ध्यान रखकर पूरे लगन और तत्परता से काम करना चाहिए।एक दूसरे से असीम प्यार करे, दूसरों की सुविधा को प्राथमिकता दे।आवेश,कटुता, आलस,अकर्मण्यता, दुर्भाव,अहंकार आदि को त्यागकर बिखरते परिवार और रिश्तों को बचाया जा सकता है। आइए हम भी कोशिश करे और पारिवारिक जीवन सुखद बनाएँ।

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