संदेश

नवंबर, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
 बिलई टुरी "बिलई टुरी आगे, बिलई टुरी आगे...."जइसे ही दीपा घर ले बाहिर निकले सब्बो टुरी टुरा मन ओखर मजाक उड़ाना चालू कर देवय।इस्कूल म तको ओखर संगवारी मन बात बात म ओला बिलई बिलई कहिके चिढावय।दीपा थोरकुन दबे रंग के रिहिस।सब्बो झन ओला दीपा नइ बोल के बिलई बोलय।दीपा मने मन अब्बड़ रोवय।अपन रंग रूप से ओहा चिढ़े ल धर लिस।जे देखे ते ओखर रंगे रूप ल लेके ताना मारय।ओखर मन के पीरा ल कोनो समझय के कोसिस नइ करय।एखर सेती दीपा के मन इस्कूल म तको नइ लगय।पढ़ई ले तको रुचि हट गे।अब ओहा अइसन लइका मन संग खेलय, जेहा इस्कूल नइ जावय।उही मन ओखर संगवारी बनगे।दीपा के माँ बाबू मन ओला अब्बड़ खिसियाय काबर कि ओहा पढ़ई लिखई म अब एक्को कन धियान नइ देवय।धियान दिही ते दिही कइसे ,जब ओखर मने ह इस्कूल म नइ लगय। न संगवारी मन ,न गुरुजी मन ,कोनो ओखर मन के बात ल ,ओखर पीरा ल नइ समझिस। माँ बाबू मन तको नइ समझ सकिस के नानकुन नोनी के मन म का बीतत रिहिस?उही बखत ओखर इस्कूल म हिन्दी के नवा गुरुजी आइस।ओकर पढ़ाय के तरीका अतेक सुग्घर रहाय कि सब्बो लइका मन बड़ धियान मगन होके ,ओखर बात ल सुनय।दीपा ल तको पहिली बार बहुतेच बने लगिस।ओला ए गुरुजी...

नवा गुरुजी

  नवा गुरुजी एक गाँव के सरकारी इस्कूल म एक झन नवा गुरुजी विनोद दत्ता  आये रिहिस।देखे म बड़ ऊँच पुर अउ कर्री कर्रीआँखि वाला रिहिस।जइसे ही लइका मन ल ओखर आये के पता चलिस ओखरे बारे म पूरा इस्कूल म चर्चा चले ल लग गे।नवा गुरुजी कइसे होही, कइसे पढ़ाही ,सब्बो लइका मन इहि सोचत रहाय।ओमन बस अतके ही जान पाइस की दत्ता गुरुजी ह गणित पढ़ाही। उहि इस्कूल म सोनू दसवी कक्षा म पढ़त रिहिस।दत्ता गुरुजी सोनू के कक्षा म गिस।ओला देखते साथ सब्बो लइका मन लकर धकर अपन अपन जगा म खड़े होगे।नवा गुरुजी ह लइका मन ल  खड़े होवत देखके खुश होगे। ओहा चारों मुड़ा ल देखिस त एक झन सोनू नाँव के लइका ह बेंच म बइठे रिहिस ,ओला बइठे देख के गुरुजी ह तमतमागे।ओला अब्बड़ सुनाइस तभो ले सोनू ह नइ उठिस।गुरुजी के पारा चढ़ गे ओहा एक ठन छड़ी ल धरिस अउ सोनू ल तड़ातड़  मारे ल धर लिस।पूरा कक्षा म डर के मारे सन्नाटा छा गे अउ सोनू ह सुसक सुसक के रोथे। गुरुजी ल अउ घुस्सा आथे अउ किथे चल उठ ,खड़े हो अउ कुकरा बन। सोनू रोवत रोवत अपन जगा म ही बइठे रिहिस।गुरुजी ह किथे अरे ढीट ते काबर खड़े नइ होतस ,तोड़ गोड़ टूट गे हे का। सोनू अउ जोर जोर से रोथे।...
 बबा के सुरता  छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह 1.अक्ति तिहार आज मीनू हा अब्बड़ खुस रिहिस काबर कि बबा हा ओखर बर बजार ले माटी के सुग्घर पुतरा पुतरी लाय रिहिस।अक्ति तिहार मनाय बर जम्मो लइका सियान मन बिहिनिया ले अपन अपन काम बुता म लगे रिहिस।अक्ति तिहार म पुतरा पुतरी के बिहाव करे बर, मीनू हा पुतरा पुतरी बर कपड़ा लत्ता अऊ गहना गुठी के तय्यारी म लगे रिहिस।मड़वा गड़ाय बर डोकरी दाई हा अँगना ल गोबर म लिपत रिहिस तहान ओखर बबा हा नान नान लउठी के मड़वा गड़ाइस अऊ ओला आमा के पत्ता म छाइस।मीनू हा चाँउर ल रंगा के मड़वा के चारो मुड़ा ल सजाइस,नान नान चुकिया म पानी भर के राखिस, चउक पुरिस अउ दिया बारिस। बिहिनिया ले ओखर जम्मों संगवारी मन ओखरे घर म सकलाय रिहिस।बबा हा बाल्टी अऊ लोटा ल धर के गाँव के जम्मों देवता धामी अऊ रुख राई म पानी डारे बर गिस।अक्ति के दिन जम्मों किसान मन इहि काम करय।ओमन ठाकुर देवता म एक एक दोना धान चढ़ाके पूजा पाठ करिस। लइका मन पुतरा पुतरी के बिहाव रचाय म मगन रिहिस।मीनू तको अपन पुतरा पुतरी के बिहाव के जोखा म लगे रिहिस। लइका मन के धमाल बाजा पार्टी हा बाजा अऊ मुहरी ल बजावत रिहिस अउ कूद कूद के नाचत रि...
 छत्तीसगढ़ी वर्णमाला ***************************** अ - अ से अथान अम्मट ,नुनचुर। आ - आ से आमा हरियर,  पिंयर। इ - इ से इड़हर अब्बड़ सुहाथे। ई- ई से ईंटा जोरे म बड़ मजा आथे। उ - उ से उरिद दार के बरा बनाबो। ऊ - ऊ से ऊँटवा ल पत्ता खवाबो। ए - ए से एक्कागाड़ी म घुमय ल जाबो। ऐ - ऐ से ऐंठी पहिन के सबला देखाबो। ओ - ओ से ओंगन तेल ल चक्का म लगाबो। औ - औ से औघड़ बबा ले दूरिहा  रहिबो। ******************************* क - क से करसी के पानी पिबो। ख - ख से खटिया म बबा संग सुतबो। ग - ग से गरुआ के सेवा करबो। घ - घ से घर ल गोबर म लिपबो। च - च से चंउक सुग्घर पूरथे दाई। छ - छ से छत्ता म मदुरस भराही। ज - ज से जँवारा हरियर हरियर। झ - झ से झँउहा लाहुँ तोर बर। ट - ट से टठिया म बासी खाबो। ठ - ठ से ठगुवा से बाँच के रहिबो। ड - ड से डबरा के पानी देखव। ढ - ढ से ढँकना म साग ल ढाँपव। त - त से तरिया म कुदके नहाबो। थ- थ से थरहा ह देखे बर जाबो। द - द से दरमी लाली लाली। ध - ध से धनिया के महकत बारी। न - न से नरवा हमर चिन्हारी। प - प से परेवा हमर संगवारी। फ - फ से फरा चलव बनाबो। ब - ब स...
  टूटते बिखरते परिवार (चिंतन) पाश्चात्य देशों की देखादेखी या आज के शिक्षित युवाओं की सोच के कारण भारत जैसे देश में भी संयुक्त परिवार प्रणाली टूटते जा रही है।अधिकांश लोग पति पत्नी और बच्चों के साथ रहकर जीवनयापन करने की चाह रखते हैं।वे अलग घर बसाकर  संयुक्त परिवार के बोझ ,अपने कर्तव्य ,उत्तरदायित्व और नियंत्रण से स्वतंत्र होकर सुख सुविधा का जीवन जीने की चेष्टा करते हैं। पर इनके गुण दोषों पर चिंतन करें तो हम पाते हैं कि एकल परिवार शुरू शुरू में तो अच्छा लगता है क्योंकि स्वछंदता मिल जाती है पर कुछ समय के बाद परिवार की कमी खलने लगती है।नन्हें बच्चों को सम्हालने के लिए बड़े बुजुर्गों की ज़रूरत पड़ती ही है।बीमारी ,दुख दर्द, दुर्घटना,विवाह  या किसी असमर्थता के समय संयुक्त परिवार का लाभ समझ आता है। घर की पूंजी और घर का श्रम मिल जाये तो निश्चित ही लाभ होगा। बढ़ती उम्र और वृद्धावस्था को शांति से जीने के लिए संयुक्त परिवार ही अनुकूल होता है।कृषिप्रधान देशों में संयुक्त परिवार तो वरदान है।जहाँ माता पिता, भाई बहन और परिवार की समस्याओं को समझते और सुलझाते हुए व्यक्ति अपने स्वार्थ को भूलक...
 कहानी 5.गोबर की खाद रानी अपने माता पिता की लाडली बेटी थी। वह कमल के फूल की तरह सुंदर और मृदुल स्वभाव की थी। वह दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। हर बच्चे की तरह उसको भी खेलना कूदना अच्छा लगता था। कभी कभी वो खेलकूद के चक्कर में पढ़ना लिखना त्याग देती थी।एक बार उनके पिताजी ने उसको खेलते देखकर पास बुलाया और कहा, "रानी बेटी चलो पहाड़ा सुनाओ"।रानी पहाड़ा सुनाने लगी ,सुनाते सुनाते वह तेरह की पहाड़ा में आकर अटक गई। पिताजी को बहुत गुस्सा आया ,उन्होंने कहा ," जाओ गोबर बीनने और जब तक टोकरी न भरे, घर वापस मत आना"।रानी टोकरी उठाई और दोपहर की चिलचिलाती धूप में घर से निकल गई।बगीचे में उनको कहीं गोबर नहीं मिला ,वह रोते रोते आम के पेड़ की छाया में बैठ गई। उसको खोजते खोजते माँ उसके पास गई।उनको गले लगाकर चुप कराई और घर चलने के लिए बोली।"नहीं माँ ! मैं बिना गोबर लिए घर कैसे जाऊँ? बाबूजी डाँटेंगे,"रानी की कहा।माँ का दिल कहाँ मानता ,बेटी के मनोभावों को समझते हुए इधर उधर से गोबर इकट्ठा करके टोकरी में डाली और दोनों घर की ओर गए।पिताजी दरवाजे पर इंतज़ार करते बैठे थे।रानी ,माँ के आँचल में छुप ग...
  कहानी4 .प्रोत्साहन --------------- सीमा बहुत ही होनहार लड़की थी।पढ़ाई के अलावा नृत्य और गाने का उसे बहुत शौक था।अपने अच्छे व्यवहार के कारण वह अपने शिक्षकों की बहुत प्रिय छात्रा थी।शाला में वार्षिक उत्सव की तैयारी चल रही थी।सभी बच्चे तैयारी में लगे थे।जब बच्चे नृत्य का अभ्यास करते थे ,सीमा का मन भी नाचने के लिए मचल उठता था।वो अपना हाथ पाँव हिलाने लग जाती।उनके चेहरे के भावों के तो क्या कहने ,पर सारी लड़कियाँ उनका मजाक उड़ाती थी।"चल भाग लंगड़ी कहीं की ,ये तेरे बस का काम नहीं है ।" लड़कियों की ऐसी बातें सुनकर सीमा का मन टूट जाता था।वह अकेले में जाकर फूट फूट कर रोती थी।एक दिन उनकी शिक्षिका की नज़र सीमा पर पड़ी ,वह दूर खड़े होकर नृत्य का अभ्यास करती लड़कियों को देख रही थी।उनके आँखों की नमी को शिक्षिका समझ गई।वह सीमा के क़रीब जाकर उसके सिर पर हाथ फेरी।उन्होंने सीमा से उसकी उदासी का कारण पूछा।सीमा सब कुछ बता दी।शिक्षिका उन बच्चों के पास सीमा को ले जाकर बोली , "सीमा इस वार्षिक उत्सव के सभी नृत्य के लिए गायन करेगी।सीमा की आवाज बहुत ही मधुर है और यह बहुत अच्छा गाना भी गाती है।ये सुनकर सभी...
 कहानी 3. मेला ******* हर दिन के विपरीत आज दीनू तड़के ही उठकर नहा धोकर नए कपड़े पहनकर तैयार हो गया था।वह बहुत खुश था ,दादाजी के साथ मेला जो जाने वाला था।हर साल उनके दादाजी ,सभी बच्चों को बैलगाड़ी में बिठाकर मेला ले जाते थे।पहले दिन ही बैलगाड़ी और बैलों को चकाचक तैयार कर लिया जाता था।आज भी गाड़ी पूरी तरह से सज गई थी।बैलों के सींग में पेंट भी चुके थे। बैलों के गले में रंग बिरंगी गोटियों और घुँघरू वाले माला भी पहनाये जा चुके थे।दीनू का उत्साह बढ़ता ही रहा था।अब उससे सहन नहीं हो रहा था।उसका मन मेला जाने के लिए उतावला हो रहा था।उसने दादाजी से कहा " कब निकलेंगे दादाजी ,अब तो चलो, बहुत देर हो गई है"।       दीनू के बढ़ते उत्साह को देख ,थोड़ी ही देर में सब लोग मेले के लिए रवाना हुए।रास्ते भर बैलगाड़ी में मस्ती करते करते बच्चे आखिर मेले में पहुँच ही गए।दूर से ही भीड़ दिखाई दे रही थी।चारों तरफ बैलगाड़ी और लोग दिखाई दे रहे थे।मंदिरों की घंटियाँ भी कानों में सुनाई पड़ने लगी।एक खाली जगह दिखने पर प्रेमू काका बैलगाड़ी को रोके फिर सभी लोग बैलगाड़ी से उतरे।गंगू मंगू (बैल) को भी खाने के...
 कहानी 2.मुर्गे की चोरी नीरज को पक्षियों से कुछ ज्यादा ही लगाव था।वह हमेशा अपने पिताजी से घर में कोई भी पक्षी पालने की जिद करते रहता था, पर उनके पिताजी बिल्कुल भी इसके पक्ष में नहीं थे।एक बार नीरज ख़ुद ही बाजार से एक मुर्गा खरीदकर ले आया।मुर्गा दिखने में बहुत सुंदर और तन्दरुस्त था।नीरज ने उनका नाम रखा 'मटुकनाथ'।वह मटुकनाथ का पूरा ध्यान रखता था।खाने पीने की कोई कमी नहीं होने देता था।कुत्ते बिल्ली से भी बचाकर रखता था।एक दिन उनके माता पिता किसी काम से बाहर गए।वे मटुकनाथ की देखभाल और घर के देखरेख की जिम्मेदारी नीरज को सौंप कर गए।नीरज घर के कामकाज में उलझ गया और उसका ध्यान कुछ देर के लिए मटुकनाथ से हट गया।अचानक मटुकनाथ का ख़्याल आते ही वह ,घर के पीछे के आँगन में गया।आँगन में मटुकनाथ को न पाकर वह बहुत चिंतित हो गया,इधर उधर खोजने पर भी मटुकनाथ नहीं मिल पाया।उनके आँख से आँसू झरने लगे।अपने दोस्तों को उसने सारी बात बताई।सभी दोस्त मटुकनाथ को ढूँढनें की योजना बनाकर आस पास के सभी घरों में गए।किसी के घर में भी मटुकनाथ नहीं मिला।बच्चों को याद आया कि वे लोग तो छक्कन चाचा के यहाँ जाना ही भूल गए।स...
 कहानी 1. भूल का एहसास किसी गाँव के सरकारी स्कूल में सोनू ,कक्षा आठवी का छात्र था। वह बहुत ही सीधा-साधा और होनहार छात्र था । उसके स्कूल की ख्याति दूर दूर तक फैली थी ,कारण था वहाँ के प्रतिभावान बच्चों की उपलब्धि और स्कूल का अनुशासन। उसके स्कूल में एक बार गणित विषय के एक नए शिक्षक 'दत्ता सर' आये। दिखने में काफी ऊँचे पूरे और आकर्षक व्यक्तित्व के वे धनी थे। पहले ही दिन वे सोनू की कक्षा में गए। उनको देखते ही सभी बच्चे अपनी जगह में खड़े हो गए। ऐसा सम्मान पाकर दत्ता सर के चेहरे में मुस्कान ख़िल गई। अचानक उनकी नज़र सोनू पर पड़ी जो कुर्सी में ही बैठा था। क्रोध से वे तिलमिला उठे। गुस्से में वे उनके क़रीब गए। सोनू फिर भी नहीं उठा। "तेरी इतनी हिम्मत ,शिक्षक के सामने भी बैठा है। तू खड़ा नहीं हो सकता क्या ?" दत्ता सर ने कहा ।       सोनू कुछ नहीं बोल पाया। वह कोई सफाई दे पाता उससे पहले ही दत्ता सर ने 'आव देखा न ताव' ,और पास में पड़ी छड़ी उठाई और  उनकी हथेलियों को पीटना शुरू कर दिए। पूरी कक्षा में डर के मारे सन्नाटा छा गया। तभी एक बच्चे ने घबराते हुए कहा ," सर जी सोनू खड़ा नह...