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कुण्डलिया छत्तीसगढ़ी में

 बादर करिया बादर छाय हे, मन मा जागे आस। आके बरखा आज तँय, बुझा धरा के प्यास।। बुझा धरा के प्यास, गिरा दे अतका पानी। नाचय गावय खेत, पहिन के लुगरा धानी।। बरसे मूसर धार, भरे टिपटिप ले तरिया। हाँसत हवय किसान, देख के बादर करिया।। बादर करिया आय हे, पानी बड़ बरसाय। हरियर खेती खार हा, सबके मन ला भाय।। सबके मन ला भाय, लबालब तरिया भरही। जावत खेत किसान, काम खेती के करही।। धरती के श्रृंगार ,  दूब के हरियर चादर। झूमत हावय पेड़, देख के करिया बादर। आ जा बरसा झूम के, देखत बाट किसान। खेत खार हा भींजही, तब हरियाही धान।। तब हरियाही धान, झूमही डारा पाना। कलकल नरवा धार, मगन हो गाही गाना।। होही पोठ अनाज, बजाही बादर बाजा। हवय अगोरा तोर, झूम के बरसा आ जा।।

छत्तीसगढ़ी कविताएँ

  1.मोर गाँव *************** बड़ सुग्घर मोर गाँव। हाबे जिहाँ अमरैया के छाँव। घर के बाहिर बने हे चौरा। खेलथे लइका मन बाटी भौंरा। बबा सुनाथे सुग्घर कहिनि। बइठ के सुनथे भाई बहिनी। हरियर हरियर खेत खार। छानी मा छा हे रखिया के नार। कुकरा बासथे पहाती बेरा। चिरई चिरगुन मन डारे डेरा। पड़ जाथे छिरा छिटका मुहाटी । चंदन कस महके गाँव के माटी। सरर सरर चलथे पुरवैया। नाँगर धरके जाथे भैया। गरुवा भैंसा के सेवा करथन। गोबर कचरा ले खातु बनाथन तरिया नरवा ला सफ्फा रखथन। रुख राई ला नइ काटन। लइका मन स्कूल जाथे। पढ़ लिख के नाम कमाथे। शिक्षा बनगे हमर हथियार। चारो मुड़ा होगे उजियार। 2. बेटी ************ बेटी बिना हे जग सुन्ना, बेटी जिनगी के आधार। बेटी अंजोर भुंइया के, बेटी बिना जग अँधियार। झन मारव कोख मा ओला, देवव जीये के अधिकार। झन कोसे वो अपन भाग ला, मुस्काही पा के दुलार। फुलवारी बन जाही जिनगी, बेटी ला देवव  मान। बिना डरय बाहिर निकले, अगास मा भरय उड़ान। दुर्गा काली कस ताकत हे, छेरी पठरु झन जान। मिलही जब अवसर, तभे बनाही अपनो पहिचान। दू कुल ला जोड़थे बेटी, फूलथे फरथे जी परिवा...
 बिलई टुरी "बिलई टुरी आगे, बिलई टुरी आगे...."जइसे ही दीपा घर ले बाहिर निकले सब्बो टुरी टुरा मन ओखर मजाक उड़ाना चालू कर देवय।इस्कूल म तको ओखर संगवारी मन बात बात म ओला बिलई बिलई कहिके चिढावय।दीपा थोरकुन दबे रंग के रिहिस।सब्बो झन ओला दीपा नइ बोल के बिलई बोलय।दीपा मने मन अब्बड़ रोवय।अपन रंग रूप से ओहा चिढ़े ल धर लिस।जे देखे ते ओखर रंगे रूप ल लेके ताना मारय।ओखर मन के पीरा ल कोनो समझय के कोसिस नइ करय।एखर सेती दीपा के मन इस्कूल म तको नइ लगय।पढ़ई ले तको रुचि हट गे।अब ओहा अइसन लइका मन संग खेलय, जेहा इस्कूल नइ जावय।उही मन ओखर संगवारी बनगे।दीपा के माँ बाबू मन ओला अब्बड़ खिसियाय काबर कि ओहा पढ़ई लिखई म अब एक्को कन धियान नइ देवय।धियान दिही ते दिही कइसे ,जब ओखर मने ह इस्कूल म नइ लगय। न संगवारी मन ,न गुरुजी मन ,कोनो ओखर मन के बात ल ,ओखर पीरा ल नइ समझिस। माँ बाबू मन तको नइ समझ सकिस के नानकुन नोनी के मन म का बीतत रिहिस?उही बखत ओखर इस्कूल म हिन्दी के नवा गुरुजी आइस।ओकर पढ़ाय के तरीका अतेक सुग्घर रहाय कि सब्बो लइका मन बड़ धियान मगन होके ,ओखर बात ल सुनय।दीपा ल तको पहिली बार बहुतेच बने लगिस।ओला ए गुरुजी...

नवा गुरुजी

  नवा गुरुजी एक गाँव के सरकारी इस्कूल म एक झन नवा गुरुजी विनोद दत्ता  आये रिहिस।देखे म बड़ ऊँच पुर अउ कर्री कर्रीआँखि वाला रिहिस।जइसे ही लइका मन ल ओखर आये के पता चलिस ओखरे बारे म पूरा इस्कूल म चर्चा चले ल लग गे।नवा गुरुजी कइसे होही, कइसे पढ़ाही ,सब्बो लइका मन इहि सोचत रहाय।ओमन बस अतके ही जान पाइस की दत्ता गुरुजी ह गणित पढ़ाही। उहि इस्कूल म सोनू दसवी कक्षा म पढ़त रिहिस।दत्ता गुरुजी सोनू के कक्षा म गिस।ओला देखते साथ सब्बो लइका मन लकर धकर अपन अपन जगा म खड़े होगे।नवा गुरुजी ह लइका मन ल  खड़े होवत देखके खुश होगे। ओहा चारों मुड़ा ल देखिस त एक झन सोनू नाँव के लइका ह बेंच म बइठे रिहिस ,ओला बइठे देख के गुरुजी ह तमतमागे।ओला अब्बड़ सुनाइस तभो ले सोनू ह नइ उठिस।गुरुजी के पारा चढ़ गे ओहा एक ठन छड़ी ल धरिस अउ सोनू ल तड़ातड़  मारे ल धर लिस।पूरा कक्षा म डर के मारे सन्नाटा छा गे अउ सोनू ह सुसक सुसक के रोथे। गुरुजी ल अउ घुस्सा आथे अउ किथे चल उठ ,खड़े हो अउ कुकरा बन। सोनू रोवत रोवत अपन जगा म ही बइठे रिहिस।गुरुजी ह किथे अरे ढीट ते काबर खड़े नइ होतस ,तोड़ गोड़ टूट गे हे का। सोनू अउ जोर जोर से रोथे।...
 बबा के सुरता  छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह 1.अक्ति तिहार आज मीनू हा अब्बड़ खुस रिहिस काबर कि बबा हा ओखर बर बजार ले माटी के सुग्घर पुतरा पुतरी लाय रिहिस।अक्ति तिहार मनाय बर जम्मो लइका सियान मन बिहिनिया ले अपन अपन काम बुता म लगे रिहिस।अक्ति तिहार म पुतरा पुतरी के बिहाव करे बर, मीनू हा पुतरा पुतरी बर कपड़ा लत्ता अऊ गहना गुठी के तय्यारी म लगे रिहिस।मड़वा गड़ाय बर डोकरी दाई हा अँगना ल गोबर म लिपत रिहिस तहान ओखर बबा हा नान नान लउठी के मड़वा गड़ाइस अऊ ओला आमा के पत्ता म छाइस।मीनू हा चाँउर ल रंगा के मड़वा के चारो मुड़ा ल सजाइस,नान नान चुकिया म पानी भर के राखिस, चउक पुरिस अउ दिया बारिस। बिहिनिया ले ओखर जम्मों संगवारी मन ओखरे घर म सकलाय रिहिस।बबा हा बाल्टी अऊ लोटा ल धर के गाँव के जम्मों देवता धामी अऊ रुख राई म पानी डारे बर गिस।अक्ति के दिन जम्मों किसान मन इहि काम करय।ओमन ठाकुर देवता म एक एक दोना धान चढ़ाके पूजा पाठ करिस। लइका मन पुतरा पुतरी के बिहाव रचाय म मगन रिहिस।मीनू तको अपन पुतरा पुतरी के बिहाव के जोखा म लगे रिहिस। लइका मन के धमाल बाजा पार्टी हा बाजा अऊ मुहरी ल बजावत रिहिस अउ कूद कूद के नाचत रि...
 छत्तीसगढ़ी वर्णमाला ***************************** अ - अ से अथान अम्मट ,नुनचुर। आ - आ से आमा हरियर,  पिंयर। इ - इ से इड़हर अब्बड़ सुहाथे। ई- ई से ईंटा जोरे म बड़ मजा आथे। उ - उ से उरिद दार के बरा बनाबो। ऊ - ऊ से ऊँटवा ल पत्ता खवाबो। ए - ए से एक्कागाड़ी म घुमय ल जाबो। ऐ - ऐ से ऐंठी पहिन के सबला देखाबो। ओ - ओ से ओंगन तेल ल चक्का म लगाबो। औ - औ से औघड़ बबा ले दूरिहा  रहिबो। ******************************* क - क से करसी के पानी पिबो। ख - ख से खटिया म बबा संग सुतबो। ग - ग से गरुआ के सेवा करबो। घ - घ से घर ल गोबर म लिपबो। च - च से चंउक सुग्घर पूरथे दाई। छ - छ से छत्ता म मदुरस भराही। ज - ज से जँवारा हरियर हरियर। झ - झ से झँउहा लाहुँ तोर बर। ट - ट से टठिया म बासी खाबो। ठ - ठ से ठगुवा से बाँच के रहिबो। ड - ड से डबरा के पानी देखव। ढ - ढ से ढँकना म साग ल ढाँपव। त - त से तरिया म कुदके नहाबो। थ- थ से थरहा ह देखे बर जाबो। द - द से दरमी लाली लाली। ध - ध से धनिया के महकत बारी। न - न से नरवा हमर चिन्हारी। प - प से परेवा हमर संगवारी। फ - फ से फरा चलव बनाबो। ब - ब स...
  टूटते बिखरते परिवार (चिंतन) पाश्चात्य देशों की देखादेखी या आज के शिक्षित युवाओं की सोच के कारण भारत जैसे देश में भी संयुक्त परिवार प्रणाली टूटते जा रही है।अधिकांश लोग पति पत्नी और बच्चों के साथ रहकर जीवनयापन करने की चाह रखते हैं।वे अलग घर बसाकर  संयुक्त परिवार के बोझ ,अपने कर्तव्य ,उत्तरदायित्व और नियंत्रण से स्वतंत्र होकर सुख सुविधा का जीवन जीने की चेष्टा करते हैं। पर इनके गुण दोषों पर चिंतन करें तो हम पाते हैं कि एकल परिवार शुरू शुरू में तो अच्छा लगता है क्योंकि स्वछंदता मिल जाती है पर कुछ समय के बाद परिवार की कमी खलने लगती है।नन्हें बच्चों को सम्हालने के लिए बड़े बुजुर्गों की ज़रूरत पड़ती ही है।बीमारी ,दुख दर्द, दुर्घटना,विवाह  या किसी असमर्थता के समय संयुक्त परिवार का लाभ समझ आता है। घर की पूंजी और घर का श्रम मिल जाये तो निश्चित ही लाभ होगा। बढ़ती उम्र और वृद्धावस्था को शांति से जीने के लिए संयुक्त परिवार ही अनुकूल होता है।कृषिप्रधान देशों में संयुक्त परिवार तो वरदान है।जहाँ माता पिता, भाई बहन और परिवार की समस्याओं को समझते और सुलझाते हुए व्यक्ति अपने स्वार्थ को भूलक...