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छत्तीसगढ़ी कविताएँ

  1.मोर गाँव *************** बड़ सुग्घर मोर गाँव। हाबे जिहाँ अमरैया के छाँव। घर के बाहिर बने हे चौरा। खेलथे लइका मन बाटी भौंरा। बबा सुनाथे सुग्घर कहिनि। बइठ के सुनथे भाई बहिनी। हरियर हरियर खेत खार। छानी मा छा हे रखिया के नार। कुकरा बासथे पहाती बेरा। चिरई चिरगुन मन डारे डेरा। पड़ जाथे छिरा छिटका मुहाटी । चंदन कस महके गाँव के माटी। सरर सरर चलथे पुरवैया। नाँगर धरके जाथे भैया। गरुवा भैंसा के सेवा करथन। गोबर कचरा ले खातु बनाथन तरिया नरवा ला सफ्फा रखथन। रुख राई ला नइ काटन। लइका मन स्कूल जाथे। पढ़ लिख के नाम कमाथे। शिक्षा बनगे हमर हथियार। चारो मुड़ा होगे उजियार। 2. बेटी ************ बेटी बिना हे जग सुन्ना, बेटी जिनगी के आधार। बेटी अंजोर भुंइया के, बेटी बिना जग अँधियार। झन मारव कोख मा ओला, देवव जीये के अधिकार। झन कोसे वो अपन भाग ला, मुस्काही पा के दुलार। फुलवारी बन जाही जिनगी, बेटी ला देवव  मान। बिना डरय बाहिर निकले, अगास मा भरय उड़ान। दुर्गा काली कस ताकत हे, छेरी पठरु झन जान। मिलही जब अवसर, तभे बनाही अपनो पहिचान। दू कुल ला जोड़थे बेटी, फूलथे फरथे जी परिवा...