छत्तीसगढ़ी कविताएँ

 

1.मोर गाँव
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बड़ सुग्घर मोर गाँव।
हाबे जिहाँ अमरैया के छाँव।
घर के बाहिर बने हे चौरा।
खेलथे लइका मन बाटी भौंरा।
बबा सुनाथे सुग्घर कहिनि।
बइठ के सुनथे भाई बहिनी।
हरियर हरियर खेत खार।
छानी मा छा हे रखिया के नार।
कुकरा बासथे पहाती बेरा।
चिरई चिरगुन मन डारे डेरा।
पड़ जाथे छिरा छिटका मुहाटी ।
चंदन कस महके गाँव के माटी।
सरर सरर चलथे पुरवैया।
नाँगर धरके जाथे भैया।
गरुवा भैंसा के सेवा करथन।
गोबर कचरा ले खातु बनाथन
तरिया नरवा ला सफ्फा रखथन।
रुख राई ला नइ काटन।
लइका मन स्कूल जाथे।
पढ़ लिख के नाम कमाथे।
शिक्षा बनगे हमर हथियार।
चारो मुड़ा होगे उजियार।
2. बेटी
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बेटी बिना हे जग सुन्ना, बेटी जिनगी के आधार।
बेटी अंजोर भुंइया के, बेटी बिना जग अँधियार।
झन मारव कोख मा ओला, देवव जीये के अधिकार।
झन कोसे वो अपन भाग ला, मुस्काही पा के दुलार।
फुलवारी बन जाही जिनगी, बेटी ला देवव  मान।
बिना डरय बाहिर निकले, अगास मा भरय उड़ान।
दुर्गा काली कस ताकत हे, छेरी पठरु झन जान।
मिलही जब अवसर, तभे बनाही अपनो पहिचान।
दू कुल ला जोड़थे बेटी, फूलथे फरथे जी परिवार।
झन कहव ओला दूसर के धन, चमकत हावय घर दुवार।

3. बिलई टुरी
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झन कहव मोला बिलई टुरी ,
सुन सुन के मोर माथा पिरागे।
नाँव सुने बर मेंहा तरस गेंव,
ए दुनिया रंग रूप मा मोहागे।
मोरो हावय एक ठन सुग्घर नाँव,
जेला सँगी साथी सबो भुलागे।
मन मा मइल जमय हावय,
सबके तन मा लीपा पोती होगे।
नइ समझे कोई अंतस के पीरा,
मनखे मन अब पथरा बनगे।
दूसर के खुश पर मन ला जलाथे,
दुनिया हा कतका बदलगे।
माटी के ए तन हमर,
एक दिन माटी मा मिल जाही।
मया के मीठ मीठ बोली बोलव,
अंतस ला सुख पहुँचाही।

4 .महतारी
धरती के भगवान बरोबर, मया के कोठी महतारी।
जेकर कोरा मा सरग के सुख, दया के मूरत महतारी।
का बिहिनिया अउ का संझा, काम करथे दिन भर।
राँध के पहिली सब ला खवाथे, तभे खाथे वो हर।
लाँघन भूखन रहिके वोहा, सब ला देथे ताते तात।
ओला नइ मिलय कभू छुट्टी, रहय गर्मी या बरसात।
झाँझ मा छैंहा बन जाथे, जाड़ मा बन जाथे घाम।
ओकर अँचरा के असीस मा, लइका कमाथे नाम।
घर महकथे फुलवारी कस, महतारी करथे तियाग।
जेकर संग महतारी हावय, जाग जाथे ओकर भाग।
5. बाम्हन चिरई
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तीरे तीर अँगना परछी मा,
फुदकत रहिथे बाम्हन चिरई।
बड़े बिहिनिया सब ला जगाथे,
चींव चींव करथे बाम्हन चिरई।
खोलखा मा खोंधरा बनाथे,
दरपन ला ठोनकथे बाम्हन चिरई।
छप छप करथे पानी मा ,
बड़ मिहनत करथे बाम्हन चिरई।
फल फूल अन्न ला खाथे,
घर के सोभा बढ़ाथे बाम्हन चिरई।
सुन्ना लागथे ओकर बिना,
अब दिखय नइ बाम्हन चिरई।
6. मेला
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चारों कोती मनखे मनखे।
अब्बड़ सजे हवय जी  मेला।
रहचुली ढेलवा अउ रंग रंग के झूलना।
कतको जिनिस के लगे हे ठेला।
नदिया मा कर के असनान।
साधु संत मन करत हे धियान।
बेचात हे मंदिर के बाहिर।
नरियर धतूरा अउ बेल पान।
खड़े हावय सब भक्त मन
बिराजे हे शंकर भगवान।
खेलउना के लगे हे बजार।
लइका मन खाथे खुसियार।
घोड़ा हाथी अउ डमडम बाजा।
खेलउना लेके बनगे राजा।
काड़ी मिठई हा सबला सुहाथे।
मनियारी कोती महतारी मन जाथे।
बड़ मजा करथे लइका मन।
सब ले सुग्घर होथे बचपन।
7. गुरुजी
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देके ज्ञान लइका मन ला, रद्दा नवा दिखाथे गुरुजी।
पुस्तक कापी अउ कलम ला, हाथ मा देथे गुरुजी।
कक्षा मा बइठा के रोज, जीए के ढंग सिखाथे गुरुजी।
दुनिया मा का का होवत हे, एला तको बताथे गुरुजी।
भर देथे मन मा आस, होवन नइ देवय निराश गुरुजी।
दीया जइसन बरत रहिथे, बगराथे जग मा अंजोर गुरुजी।
पढ़ लेथे लइका के मन ला, सुख दुख मा रहिथे संग गुरुजी।
देथे आशीष आघू बढ़े बर, मुड़ी मा रखथे हाथ गुरुजी।
दाई ददा हा जनम देथे, जिनगी के कला सिखाथे गुरुजी।
भगवान हरय वोहा धरती के, सच के महता बताथे गुरुजी।
सादा जिनगी जीथे जिनगी भर, ज्ञान के भंडार गुरुजी।
भविष्य बनाथे लइका मन के, देथे मया दुलार गुरुजी।
8 .गरमी
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आगी बरसावत हे सुरुज बबा हा, चारों मुड़ा घाम।
तात तात हवा चलत हे, कइसे करबो अब काम।
झाँझ धर के गरमी आगे, जाड़ हा भाग गे तैहा।
रुख राई के पत्ता अइलागे, खोजत हे सब छइहाँ।
बूड़े हे लइका मन तरिया मा, लेथे गरमी के मजा।
पछीना के धार बोहात हे, होगे सियान बर सजा।
गली गली मा कुल्फी वाला, बेचत हे बरफ के गोला।
कोनो पीयत हे ठंडा सरबत, कोनो हा कोकाकोला।
करसी मा भरे हे ठंडा पानी, पी के पियास बुझावव।
गरमी बाढ़त हे अब्बड़ सँगी ,जुरमिल के पेड़ लगावव।
9 .बरसात
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बोरा मा भर के लाहे पानी, करिया करिया बादर राजा।
चमकावत हे बिजली अउ, बजावत हे गड़गड़ बाजा।
खलबल खलबल गात हे नरवा, भरगे सब्बो ताल तलैया।
जगा जगा पिटपिटी दिखत हे, टर्रावत हावय मेचका भैया।
झड़ी लगा दिस बादर हा, गाँव गली मा चिखला होगे।
काम चलत हे खेतीबाड़ी के, नाँगर मा बइला फँदागे।
कोहड़ा रखिया तुमा के नार, फूले बर माते हे छानी मा।
डोंगा बना के लइका मन, चलावत हावय पानी मा।

10 .नशा

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जे मनखे करथे नशा, होथे जी ओखर नाश।
सुध नइ राहय मान के, जइसे जिंदा लाश।।
नशा नाश के जड़ हरय, रहव नशा ले दूरिहा।
जिनगी के ए बैरी आय, धियान लगा के सुन।
तन मन हो जथे रोगी, ए बात ला तँय गुन।
छीन लेथे घर के सुख, होथे परिवार मा झगड़ा।
बड़ अमोल मानुष तन, पालव झन ए लफड़ा।
खावव सब्जी फल अनाज, अउ पियो रोज दूध।
स्वस्थ राहव सुखी राहव, राखव अपन सुध।
11 .सुग्घर छत्तीसगढ़
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चंदा सुरुज कस चमकाबो , छत्तीसगढ़ ला अइसन बनाबो।
जुग जुग ले नाँव रहाय, जुरमिल के सुग्घर छत्तीसगढ़ बनाबो।
हरियर हरियर रुख राई, नरवा नदियाँ के झन सूखय पानी।
मनखे मन रिथे गरुवा बरोबर, मीठ मीठ लागय हमर बानी।
पढ़ लिख के मान बढ़ाबो , मया के अंजोर बगराबो।
नइ करन लाई लिगरी, लबरा मन से दूरिहा रहिबो।
जुरमिल के सुग्घर छत्तीसगढ़ बनाबो......................
किसम किसम के धान बोबो, किसम किसम के ओनहारी ।
दाई दादा हा हमर देवता धामी, हमर संस्कृति हमर चिन्हारी।
छत्तीसगढ़ के पहिचान आय, नरवा गरुवा घुरवा अउ बारी।
झन नटेरे कोनो मनखे हमन ला, अऊ झन देवय कोनो गारी।
कोठी हमर भरय रहाय धान मा, चलव अइसन रद्दा बनाबो।
भरय रहाय कोठा कुरिया, जुरमिल के सुग्घर छत्तीसगढ़ बनाबो।
12. करोनी
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गोरसी मा छेना ला टोर टोर के,
दुहना मा दाई हा गोरस ला चुरोवत रहाय।
डबक डबक के ओहा ममहावत रहाय।
बिलई के जी ओला देख के ललचावत रहाय।
का का जतन नइ करय मोर दाई हा,
तोप ढाँक के गोरस ला बचावत रहाय।
पींयर पींयर साड़ही के सुरता नइ भुलावय।
फेर हमर बाँटा मा करोनी तको रहाय।
दुहना के पेंदी ला सुतई मा करो करो के,
दाई हा मीठ मीठ करोनी खवावत रहाय।
नइ भुलावन सँगी हमर दाई के मया ला,
अब दुहना अउ करोनी ह नन्दावत हावय।
13. भाजी वाला
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लेके ठेला बड़े बिहिनिया, गली मा आथे भाजी वाला।
चिल्ला चिल्ला के कइथे जी, ले लव हरियर भाजी पाला।
भाजी ले लव बाबू भइया, भाजी खाके खून बढ़ावव।
फल खाके सब सेहत बनावव, झटकुन झटकुन लेवव।
खीरा कोहड़ा अउ करेला, मँय ला हँव लाली पताल।
खाके एला स्वस्थ रहू जिनगी भर, होही सुग्घर गाल।
दाई बहिनी देखव तो, रंग बिरंग के भाजी तरकारी।
ताजा ताजा फल सब्जी खाके, भगाव इँहा ले बीमारी।
14. पानी
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बूँद बूँद कीमती पानी के, समझव ओकर मोल।
जल संकट गहरावत हे, अब तो आँखी खोल।
पानी हावय तभे जिनगी हे, बिन पानी सब सुन्ना।
पानी पानी कहत रहि जाबे, बन जाही ए पहुना।
सफ्फा राखव तरिया नदिया, झन डारव जी कचरा।
चारों मुड़ा सूक्खा पड़गे, मंडरावत हावय खतरा।
बूँद बूँद बचावव सँगी, गलती झन कर घेरी बेरी।
पानी बचाय बर करव उदिम, नइ ते हो जाही देरी।
15. नता
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नइ भूल सकन महतारी के कोरा, अउ हमर बाबू के खाँध।
दाई बबा के सुग्घर कहिनि, सब्बो सीख ला गाँठ मा बाँध।
कका काकी के मया दुलार, जइसे रुख के जुड़हा छँइहा।
माथा टेक के असीस लेथन, भगवान बरोबर हमर भुइँया।
भाई बहिनी मन सुख दुख के साथी, जिनगी ला महकाथे।
मोती मूँगा जइसे सँगवारी, कभू हँसाथे अउ कभू रोवाथे।
अनमोल होथे सब्बो रिसता नता, राखव एकर मान जी।
मया दुलार अउ असीस पाहू, करव सबके सम्मान जी।
16. शिक्षा
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शिक्षा के सूरज उगाबो, देबो लइका ला संस्कार।
होथे दुनिया मा शिक्षित अउ, सज्जन के सत्कार।
रद्दा इही दिखाथे विपदा मा, शिक्षा सुग्घर औजार।
पढ़ लिख के गुणी बनव, कर लव भवसागर पार।
ज्ञान के दीया बार के, जग ले दूर करव अँधियार।
जुरमिल के काम करहु , रिहि चारों मुड़ा उजियार।
सही गलत के अंतर ला जानव, करव बने व्यवहार।
कपट बैर ले दुरिहा रहिके, समझव जिनगी के सार।
गुरुजी मन ला आदर देवव, रहिथे ज्ञान के भंडार।
बढ़त जावव सच के रद्दा मा, झन मानहू कभू हार।
17.आमा बगइचा
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किसम किसम के आमा रुख, हावय हमर बगइचा मा।
पींयर पींयर दिखत हे आमा, आवव गोलू भोलू श्यामा।
सरसर सरसर हवा बोहात हे, गिरही पक्का पक्का आमा।
झोला धरके आहू सँगवारी, आज खाहू छकत ले आमा।
चाँटी आमा हे सबले मीठ, जे पाही वो किस्मत वाला।
खुरहेरी आमा के सुवाद ला जानव, हावय वहू निराला।
लटलट ले फरे हे अंडा आमा, दिखय मा हावय सुग्घर।
चटनी एकर गजब मिठाथे, लोड़हा आमा के अथान।
हड़ही आमा मा गुदा नइ हे, सुवाद हावय जी अम्मट।
भोथरा जाथे बत्तीस हा, खवाथे तको जी लटपट।
खोइला करके राखहू आमा ला, पाछू काम आही।
कढ़ी, बफौरी, मसूर ,भाटा, ये साग अब्बड़ मिठाही।
जइसे हावय गुन रंग रूप, तइसे तइसे नाम धरे हन।
सोभा होथे रुख हा धरती के, काटन नइ येला हमन।

























    




















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