बबा के सुरता
छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह
1.अक्ति तिहार
आज मीनू हा अब्बड़ खुस रिहिस काबर कि बबा हा ओखर बर बजार ले माटी के सुग्घर पुतरा पुतरी लाय रिहिस।अक्ति तिहार मनाय बर जम्मो लइका सियान मन बिहिनिया ले अपन अपन काम बुता म लगे रिहिस।अक्ति तिहार म पुतरा पुतरी के बिहाव करे बर, मीनू हा पुतरा पुतरी बर कपड़ा लत्ता अऊ गहना गुठी के तय्यारी म लगे रिहिस।मड़वा गड़ाय बर डोकरी दाई हा अँगना ल गोबर म लिपत रिहिस तहान ओखर बबा हा नान नान लउठी के मड़वा गड़ाइस अऊ ओला आमा के पत्ता म छाइस।मीनू हा चाँउर ल रंगा के मड़वा के चारो मुड़ा ल सजाइस,नान नान चुकिया म पानी भर के राखिस, चउक पुरिस अउ दिया बारिस।
बिहिनिया ले ओखर जम्मों संगवारी मन ओखरे घर म सकलाय रिहिस।बबा हा बाल्टी अऊ लोटा ल धर के गाँव के जम्मों देवता धामी अऊ रुख राई म पानी डारे बर गिस।अक्ति के दिन जम्मों किसान मन इहि काम करय।ओमन ठाकुर देवता म एक एक दोना धान चढ़ाके पूजा पाठ करिस। लइका मन पुतरा पुतरी के बिहाव रचाय म मगन रिहिस।मीनू तको अपन पुतरा पुतरी के बिहाव के जोखा म लगे रिहिस। लइका मन के धमाल बाजा पार्टी हा बाजा अऊ मुहरी ल बजावत रिहिस अउ कूद कूद के नाचत रिहिस।तेल हरदी मायन बरात जम्मों नेंग जोख ल करके संझा बेरा ओमन पुतरा पुतरा के बिहाव कराइस। घर के जम्मों मनखे अउ अरोसी परोसी मन मीनू के घर बिहाव म आइस अउ टिकावन टिकिस।टिकवन टिकई म मीनू के नानकुन डब्बा हा सिक्का म भरगे।जेला देखके मीनू गदगद होगे।
मीनू के महतारी हा बिहिनिया ले गुरहा चीला, गुरहा भजिया अउ रंग बिरंग के पकवान बनाय रिहिस।ओहा जम्मों झन ल रोटी पिठा खवाइस।पुतरा पुतरा के सुग्घर बिहाव करके जम्मों झन ल अब्बड़ मजा आइस। बबा के तीर म सब्बो लइका सियान मन सकला के बइठे रिहिस।बबा के इहि मया पिरीत हा जम्मों परिवार अउ परोसी मन ल बाँध के राखे रिहिस।ओखर छइँहा म जम्मों झन फलत फुलत रहाय।
अनिता चन्द्राकर व्याख्याता
भिलाई नगर छत्तीसगढ़
2. हरेली तिहार
बिहिनिया मीनू ह उठिस त रंधनी ले तेलहा तेलहा महक आत रिहिस।आँखि रमजत रमजत ओहा रंधनी कोती जाथे। माँ ह तेलइ बइठे रिहिस।गुरहा चीला अउ गुरहा भजिया चुरत रिहिस।मीनू के जी ललचा जथे।ओहा माँ के तीर म जाके पूछथे ," माँ आज का तिहार हरे?"
"बेटी आज हरेली तिहार हरे " माँ ह बताथे।
हरेली तिहार के नाँव सुनके मीनू अब्बड़ खुस हो जथे। ओहा अपन बबा करा जाके कइथे ,"बबा मोरो बर गेड़ी बना दे न ,महुँ गेड़ी चढहुँ।" बबा ह कइथे ," नोनी मन गेड़ी म नइ चढ़य , ये बाबू मन भर होथे।"मीनू के जी चुरमुर ले होगे।ओखर गेड़ी चढ़य के अब्बड़ मन करय।
ओहा सोचथे ,नोनी मन काबर गेड़ी नइ चढ़ सकय? ओहा बबा करा जाके फेर पूछथे ,"बबा नोनी मन काबर गेड़ी नइ चढ़ सकय?"जब माँ हर तको सब्बो काम करथे ,पूजा पाठ करथे ,गरवा मन ल लोंदी खवाथे।त मे काबर गेड़ी नइ चढ़ सकव?बबा हर पूजा के तइयारी म लगे रिहिस।रापा कुदारी मन ल एक कोन्टा म रखके ओला अपन कोरा म बिठाथे ,अउ कइथे ," बेटी ते गेड़ी ले गिरबे त लाग जहि ,हाथ गोड़ छोला जहि।मोर सुंदरी बेटी ल लागहि त मोला बने नइ लागय।"नइ बबा मेंहा नइ गिरव ,मोर बर गेड़ी बना दे", मीनू ह कइथे । आखरि म बबा ओखर बात ल मान के नान नान सुग्घर गेड़ी बना देथे।मीनू अब्बड़ खुस हो जथे।गेड़ी चढ़ के ओला ,ए बखत हरेली तिहार के असली मजा आइस।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें