बिलई टुरी
"बिलई टुरी आगे, बिलई टुरी आगे...."जइसे ही दीपा घर ले बाहिर निकले सब्बो टुरी टुरा मन ओखर मजाक उड़ाना चालू कर देवय।इस्कूल म तको ओखर संगवारी मन बात बात म ओला बिलई बिलई कहिके चिढावय।दीपा थोरकुन दबे रंग के रिहिस।सब्बो झन ओला दीपा नइ बोल के बिलई बोलय।दीपा मने मन अब्बड़ रोवय।अपन रंग रूप से ओहा चिढ़े ल धर लिस।जे देखे ते ओखर रंगे रूप ल लेके ताना मारय।ओखर मन के पीरा ल कोनो समझय के कोसिस नइ करय।एखर सेती दीपा के मन इस्कूल म तको नइ लगय।पढ़ई ले तको रुचि हट गे।अब ओहा अइसन लइका मन संग खेलय, जेहा इस्कूल नइ जावय।उही मन ओखर संगवारी बनगे।दीपा के माँ बाबू मन ओला अब्बड़ खिसियाय काबर कि ओहा पढ़ई लिखई म अब एक्को कन धियान नइ देवय।धियान दिही ते दिही कइसे ,जब ओखर मने ह इस्कूल म नइ लगय। न संगवारी मन ,न गुरुजी मन ,कोनो ओखर मन के बात ल ,ओखर पीरा ल नइ समझिस। माँ बाबू मन तको नइ समझ सकिस के नानकुन नोनी के मन म का बीतत रिहिस?उही बखत ओखर इस्कूल म हिन्दी के नवा गुरुजी आइस।ओकर पढ़ाय के तरीका अतेक सुग्घर रहाय कि सब्बो लइका मन बड़ धियान मगन होके ,ओखर बात ल सुनय।दीपा ल तको पहिली बार बहुतेच बने लगिस।ओला ए गुरुजी के पढ़ई ,ओखर बोलइ सब्बो बने लगय।हिन्दी के कहिनी पढ़ावत पढ़ावत गुरुजी हर जिनगी म काम आय के बात,
तको बतावय।सब्बो लइका के मन म ओ गुरुजी के जगा बनगे।गुरुजी हर तको सब्बो लइका ल अपन लइका बरोबर मया करय। गुरुजी हर दीपा के मन के भाव ल तको पढ़ डरिस।ओखर समस्या ओखर पीरा त समझे म गुरुजी ल जादा बखत नइ लागिस।कहिनी अउ अपन बात के जादू से दीपा ल समझावत रहाय।सब्बो लइका मन ल समझाइस कि, " रंग रूप से कुछु नइ होवय।ये माटी के तन हर माटी म मिल जहि, हमर गुन बस काम आहि ,काकरो हाँसी नइ उड़ाना चाही।"सब्बो लइका मन ल ए बात समझ म आगे। सबले जादा बदलाव दीपा के मन म होइस।ओहा दूसर के बात ल नइ सुनके अपन पढ़ई लिखई
म अपन पूरा धियान लगाइस ,अउ अपन जिनगी ल सँवारिस।
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