कहानी 3. मेला
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हर दिन के विपरीत आज दीनू तड़के ही उठकर नहा धोकर नए कपड़े पहनकर तैयार हो गया था।वह बहुत खुश था ,दादाजी के साथ मेला जो जाने वाला था।हर साल उनके दादाजी ,सभी बच्चों को बैलगाड़ी में बिठाकर मेला ले जाते थे।पहले दिन ही बैलगाड़ी और बैलों को चकाचक तैयार कर लिया जाता था।आज भी गाड़ी पूरी तरह से सज गई थी।बैलों के सींग में पेंट भी चुके थे। बैलों के गले में रंग बिरंगी गोटियों और घुँघरू वाले माला भी पहनाये जा चुके थे।दीनू का उत्साह बढ़ता ही रहा था।अब उससे सहन नहीं हो रहा था।उसका मन मेला जाने के लिए उतावला हो रहा था।उसने दादाजी से कहा " कब निकलेंगे दादाजी ,अब तो चलो, बहुत देर हो गई है"।
दीनू के बढ़ते उत्साह को देख ,थोड़ी ही देर में सब लोग मेले के लिए रवाना हुए।रास्ते भर बैलगाड़ी में मस्ती करते करते बच्चे आखिर मेले में पहुँच ही गए।दूर से ही भीड़ दिखाई दे रही थी।चारों तरफ बैलगाड़ी और लोग दिखाई दे रहे थे।मंदिरों की घंटियाँ भी कानों में सुनाई पड़ने लगी।एक खाली जगह दिखने पर प्रेमू काका बैलगाड़ी को रोके फिर सभी लोग बैलगाड़ी से उतरे।गंगू मंगू (बैल) को भी खाने के लिए पैरा भूसा दिया गया।बच्चों के साथ साथ प्रेमू काका भी बहुत ख़ुश नज़र आ रहे थे।कुछ देर बैठने के बाद दादाजी, सभी बच्चों को साथ लेकर मेला की ओर चले गए।पुल में भी बहुत भीड़ थी, खारून नदी में कई लोग स्नान कर रहे थे।दादाजी दीनू का हाथ पकड़े पकड़े चल रहे थे,क्योंकि वह सबसे छोटा था, सभी बच्चे भी एक दूसरे का हाथ पकड़े पकड़े दादू के पीछे पीछे चल रहे थे।सबसे पहले दादाजी बच्चों के लिए ख़ूब सारा गन्ना लिए ,ताकि वापसी में रास्ते में बच्चे उसका आनन्द ले सके और उन्हें भूख भी न लगे।मेले में तरह तरह की चीजें बिक रही थी।बच्चे खिलौने ,मिठाई ,और अपनी अपनी पसंद की चीजें खरीद रहे थे ,पर दीनू अभी तक कुछ भी नहीं लिया था।दादाजी ने कहा ," बेटा तुम भी तो अब कुछ खरीद लो अपने लिए, सभी बच्चे खरीद लिए है।" जी दादू जब मुझे अपनी पसंद की चीज मिलेगी तब मैं भी ले लूँगा ", दीनू ने कहा।दादाजी के साथ साथ सभी बच्चे हँसते मुस्कुराते मेले में घूम रहे थे।अचानक दीनू के कदम लोहे की दुकान के सामने रुक गए।दुकानदार के पास जाकर वह मोल भाव करने लगा।दादाजी ने पीछे मुड़कर देखा ,अरे दीनू इस लोहे की दुकान में तुम क्या कर रहे हो?आओ इधर आओ ,अब आगे भी तो जाना है" ,दादाजी ने कहा।
"थोड़ी देर रुको दादाजी ,मैं अभी हँसिया लेकर आता हूँ ।" अरे बेटा,अब हँसिये का क्या करोगे" ? दादाजी ने आश्चर्य से पूछा। "घर की हँसिया टेढ़ी मेढ़ी और पुरानी हो गई है ,माँ की उँगलियाँ कई बार उससे कट जाती है , मुझे माँ के लिए ये नया वाला हँसिया लेना है ।" दीनू का अपनी माँ के प्रति परवाह, चिंता और प्यार देखकर दादाजी गदगद हो गए।वे लोग हँसिया लिए और आगे बढ़े।अब दीनू बहुत खुश था ,उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानों वो 'ईदगाह ' कहानी का 'हामिद' हो।वही मुंशी प्रेमचंद की कहानी जो एक बार उनके गुरुजी कक्षा में सुनाये थे।जिसे सुनकर दीनू की आँखें भर आई थी, उस नन्हें से बच्चे को अपनी जिम्मेदारी का बोध हो गया था।अपनी माँ के प्रति कर्तव्य निभाकर आज उसे असीम आनंदानुभूति हो रही थी।दादाजी दीनू के शिक्षक को मन ही मन धन्यवाद दे रहे थे।बच्चों को सुनाई जाने वाली ये कहानियाँ केवल कहानियाँ ही नहीं होती ,वे बच्चों के मन में अमिट छाप छोड़कर उनका मार्ग प्रशस्त करती हैं ,और उन्हें अच्छा इंसान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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