कहानी 2.मुर्गे की चोरी

नीरज को पक्षियों से कुछ ज्यादा ही लगाव था।वह हमेशा अपने पिताजी से घर में कोई भी पक्षी पालने की जिद करते रहता था, पर उनके पिताजी बिल्कुल भी इसके पक्ष में नहीं थे।एक बार नीरज ख़ुद ही बाजार से एक मुर्गा खरीदकर ले आया।मुर्गा दिखने में बहुत सुंदर और तन्दरुस्त था।नीरज ने उनका नाम रखा 'मटुकनाथ'।वह मटुकनाथ का पूरा ध्यान रखता था।खाने पीने की कोई कमी नहीं होने देता था।कुत्ते बिल्ली से भी बचाकर रखता था।एक दिन उनके माता पिता किसी काम से बाहर गए।वे मटुकनाथ की देखभाल और घर के देखरेख की जिम्मेदारी नीरज को सौंप कर गए।नीरज घर के कामकाज में उलझ गया और उसका ध्यान कुछ देर के लिए मटुकनाथ से हट गया।अचानक मटुकनाथ का ख़्याल आते ही वह ,घर के पीछे के आँगन में गया।आँगन में मटुकनाथ को न पाकर वह बहुत चिंतित हो गया,इधर उधर खोजने पर भी मटुकनाथ नहीं मिल पाया।उनके आँख से आँसू झरने लगे।अपने दोस्तों को उसने सारी बात बताई।सभी दोस्त मटुकनाथ को ढूँढनें की योजना बनाकर आस पास के सभी घरों में गए।किसी के घर में भी मटुकनाथ नहीं मिला।बच्चों को याद आया कि वे लोग तो छक्कन चाचा के यहाँ जाना ही भूल गए।सारे बच्चे दौड़ते हुए छक्कन चाचा के घर में घुस गए।उनको देखते ही छक्कन चाचा चिल्लाने लगे, " अरे तुम्हारा मुर्गा मेरे घर में नहीं है, क्यों अंदर जा रहे हो तुम लोग?" ये सुनकर बच्चों का शक यकीन में बदल गया।वे बोले, "चाचाजी हमने तो आपसे मुर्गे के बारे में पूछा ही नहीं फिर आपको कैसे पता.......?"सभी बच्चे भीतर जाकर सारे कमरे छान मारे,भीतर बहुत अंधेरा था।तभी ' कुकड़ू कू, कुकड़ू  कू ' की आवाज आई।आवाज सुनकर बच्चे उधर ही भागे।एक बड़ी सी टोकरी के अंदर, छक्कन चाचा ने मटुकनाथ को छुपा दिया था।टोकरी हटाकर नीरज उसे गोद में उठा लिया। वह मटुकनाथ को पाकर बहुत खुश हुआ। बच्चे मटुकनाथ को लेकर बाहर आये और छक्कन चाचा से बोले, " चाचाजी कभी भी झूठ नहीं बोलना चाहिए।"  फिर सभी बच्चे मटुकनाथ को लेकर नीरज के घर गए।
सीख:- कभी कभी बच्चे भी हमें सीखा जाते हैं कि दूसरे की चीज को छुपाना और झूठ बोलना गलत बात है।

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