कहानी 5.गोबर की खाद रानी अपने माता पिता की लाडली बेटी थी। वह कमल के फूल की तरह सुंदर और मृदुल स्वभाव की थी। वह दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। हर बच्चे की तरह उसको भी खेलना कूदना अच्छा लगता था। कभी कभी वो खेलकूद के चक्कर में पढ़ना लिखना त्याग देती थी।एक बार उनके पिताजी ने उसको खेलते देखकर पास बुलाया और कहा, "रानी बेटी चलो पहाड़ा सुनाओ"।रानी पहाड़ा सुनाने लगी ,सुनाते सुनाते वह तेरह की पहाड़ा में आकर अटक गई। पिताजी को बहुत गुस्सा आया ,उन्होंने कहा ," जाओ गोबर बीनने और जब तक टोकरी न भरे, घर वापस मत आना"।रानी टोकरी उठाई और दोपहर की चिलचिलाती धूप में घर से निकल गई।बगीचे में उनको कहीं गोबर नहीं मिला ,वह रोते रोते आम के पेड़ की छाया में बैठ गई। उसको खोजते खोजते माँ उसके पास गई।उनको गले लगाकर चुप कराई और घर चलने के लिए बोली।"नहीं माँ ! मैं बिना गोबर लिए घर कैसे जाऊँ? बाबूजी डाँटेंगे,"रानी की कहा।माँ का दिल कहाँ मानता ,बेटी के मनोभावों को समझते हुए इधर उधर से गोबर इकट्ठा करके टोकरी में डाली और दोनों घर की ओर गए।पिताजी दरवाजे पर इंतज़ार करते बैठे थे।रानी ,माँ के आँचल में छुप ग...
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छत्तीसगढ़ी वर्णमाला ***************************** अ - अ से अथान अम्मट ,नुनचुर। आ - आ से आमा हरियर, पिंयर। इ - इ से इड़हर अब्बड़ सुहाथे। ई- ई से ईंटा जोरे म बड़ मजा आथे। उ - उ से उरिद दार के बरा बनाबो। ऊ - ऊ से ऊँटवा ल पत्ता खवाबो। ए - ए से एक्कागाड़ी म घुमय ल जाबो। ऐ - ऐ से ऐंठी पहिन के सबला देखाबो। ओ - ओ से ओंगन तेल ल चक्का म लगाबो। औ - औ से औघड़ बबा ले दूरिहा रहिबो। ******************************* क - क से करसी के पानी पिबो। ख - ख से खटिया म बबा संग सुतबो। ग - ग से गरुआ के सेवा करबो। घ - घ से घर ल गोबर म लिपबो। च - च से चंउक सुग्घर पूरथे दाई। छ - छ से छत्ता म मदुरस भराही। ज - ज से जँवारा हरियर हरियर। झ - झ से झँउहा लाहुँ तोर बर। ट - ट से टठिया म बासी खाबो। ठ - ठ से ठगुवा से बाँच के रहिबो। ड - ड से डबरा के पानी देखव। ढ - ढ से ढँकना म साग ल ढाँपव। त - त से तरिया म कुदके नहाबो। थ- थ से थरहा ह देखे बर जाबो। द - द से दरमी लाली लाली। ध - ध से धनिया के महकत बारी। न - न से नरवा हमर चिन्हारी। प - प से परेवा हमर संगवारी। फ - फ से फरा चलव बनाबो। ब - ब स...
छत्तीसगढ़ी कविताएँ
1.मोर गाँव *************** बड़ सुग्घर मोर गाँव। हाबे जिहाँ अमरैया के छाँव। घर के बाहिर बने हे चौरा। खेलथे लइका मन बाटी भौंरा। बबा सुनाथे सुग्घर कहिनि। बइठ के सुनथे भाई बहिनी। हरियर हरियर खेत खार। छानी मा छा हे रखिया के नार। कुकरा बासथे पहाती बेरा। चिरई चिरगुन मन डारे डेरा। पड़ जाथे छिरा छिटका मुहाटी । चंदन कस महके गाँव के माटी। सरर सरर चलथे पुरवैया। नाँगर धरके जाथे भैया। गरुवा भैंसा के सेवा करथन। गोबर कचरा ले खातु बनाथन तरिया नरवा ला सफ्फा रखथन। रुख राई ला नइ काटन। लइका मन स्कूल जाथे। पढ़ लिख के नाम कमाथे। शिक्षा बनगे हमर हथियार। चारो मुड़ा होगे उजियार। 2. बेटी ************ बेटी बिना हे जग सुन्ना, बेटी जिनगी के आधार। बेटी अंजोर भुंइया के, बेटी बिना जग अँधियार। झन मारव कोख मा ओला, देवव जीये के अधिकार। झन कोसे वो अपन भाग ला, मुस्काही पा के दुलार। फुलवारी बन जाही जिनगी, बेटी ला देवव मान। बिना डरय बाहिर निकले, अगास मा भरय उड़ान। दुर्गा काली कस ताकत हे, छेरी पठरु झन जान। मिलही जब अवसर, तभे बनाही अपनो पहिचान। दू कुल ला जोड़थे बेटी, फूलथे फरथे जी परिवा...
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